

नई दिल्ली : “दिल्ली किसी के बाप की नहीं है जो रोकेगा उसका ब्कक्ल (खाल) उतार उधेड़ देंगे”। यह धमकी दी गई थी भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत के द्वारा समाचार चैनलों को।
26 जनवरी गन्तन्त्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड को लेकर किसान नेताओं ने जिस तरह से रट लगा रखी इसके पीछे सरकार और देश के खिलाफ किसी षड्यंत्र की शंका बलवती कर रही है। ट्रैक्टर परेड को लेकर कुछ आंदोलनकारी नेताओं ने वार्ता की है जिसमें डाक्टर दर्शन पाल, योगेंदर लेफ्ट विंग से जुड़े नेता हैं। इन लोगों ने दिल्ली पुलिस, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के पुलिस अधिकारीयों के साथ तीसरे दौर की बैठक भी की है। इन्होने दिल्ली पुलिस के द्वारा सुझाये गए KMP यानी कुंडली, मानेसर, पानीपत एक्सप्रेस वे पर ट्रैक्टर परेड निकालने की बात को ठुकरा दिया है और साफ़ साफ़ दो टूक कह दिया की ट्रैक्टर रैली दिल्ली के आउटर रिंग रोड़ पर ही निकालेंगे और धमकी भी देकर कह दिया यदि दिल्ली पुलिस इजाजत नहीं देती है तो भी ट्रैक्टर निकालेंगे।
दिल्ली पुलिस और गृह मंत्रालय यह जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। दिल्ली पुलिस किसी भी कीमत पर लाखों की तायदाद में ट्रैक्टरों की रैली को दिल्ली के भीतर प्रवेश करने की इजाजत नहीं दे सकती। हालाँकि दिल्ली पुलिस ने इनको KMP का विकल्प दे दिया है। मगर यह आंदोलनकारी आउटर रिंग रोड पर रैली निकालने के लिए जिद पर अड़े हुए हैं । अब भारत सरकार के अलावा देश के आम नागरिक को इनके इरादों के पीछे इनकी साजिश नज़र आ रही है।
इन्होने पुलिस को अपनी सफाई में कहा है की रैली को शांतिपूर्ण तरीके से निकालेंगे इसके लिए अपने हज़ारों की संख्य्या में कार्यकर्ताओं को तैनात करेंगे । आउटर रिंग रोड का मार्ग जो दिल्ली के भीतर से होकर गुजरता है। यदि इनको आने दिया गया तो लाखों की तायदाद में यह लोग दिल्ली के भीतर डेरा डालेंगे। क्योंकि इनकी पहले दिन से मंशा दिल्ली के रामलीला मैदान से जंतर मंतर तक जाने की है । रामलीला मैदान से संसद मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर है।
संसद सत्र का इन्तजार
एक गौरतलब बात यह भी सामने आई है, संसद का बजट सत्र शुरू होने वाला है, सरकार को यह भी सूचना है कि संसद के भीतर वामपंथी, कांग्रेस और विपक्षी दल हंगामा करेंगे और बाहर यह लोग अराजक माहौल बना कर संसद भवन की और बढ़ेंगे। यदि ऐसा हुआ तो पुलिस और सुरक्षा बलों से टकराव और हिंसा की स्तिथि उत्पन्न होगी और मोदी सरकार की बदनामी होगी।
12 वें दौर की बातचीत 22 जनवरी की गई है। सरकार ने अपनी ओर से अंतिम विकल्प के रूप में इस कानून को डेढ़ साल के लिए रोकने का प्रस्ताव 10 वें दौर की बैठक में रख चुकी थी। अब दो साल पर भी सरकार राजी है मगर किसानों ने सरकार के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। यह हमेशा की तरह तीनों कृषि कानून को निरस्त करने पर अड़े हैं। इन्होने न तो सरकार की बात मानी और न उच्चतम न्यायलय कोई तवज्जों दी। उच्चतम न्यायलय द्वारा बनाई गई 4 सदस्यों कमेटी को भी ठुकरा दिया है।
यह लोग गणतन्त्रं दिवस वाले दिन ट्रैक्टर मार्च निकालने के लिए घोषणाएं कर रहे हैं, उससे दिल्ली में अराजकता की स्तिथि पैदा होने का खतरा बढ़ गया है। इन लोगों ने जिस तरह की तैयारियां कर रखी हैं । आज इन आंदोलनकारियों ने अभी दिल्ली को बाहर से बंधक बना रखा है। अब यह लोग दिल्ली के भीतर घुस कर अंदरूनी कब्जा करना चाहते हैं। सरकार के ख़ुफ़िया तंत्रों के पास राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी षड्यंत्रों की कई गंभीर सूचनाएं इकठ्ठी की गई हैं। दूसरी तरफ सरकार को अंतरराष्ट्रीय अलगाववादियों की धमकियाँ भी मिल रही हैं।
मोदी विरोध के कारण
भारत और उसके प्रधानमंत्री नरेंदर मोदी की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा को बहुत विरोधी लोग पचा नहीं पा रहे हैं। जब से भारत ने अपनी खुद की कोरोना वैक्सीन का सफल आविष्कार किया है। जो बिना की नुक्सान देने वाली जिसकी विदेशों मेंभारतीय वैक्सीन की मांग बढ़ गई है। भारत का रुतबा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत बढ़ गया है। प्रधान मंत्री मोदी की हर देश आज प्रशंसा कर रहा है। एक निजी चैनल इंडिया टुडे ने भारत के दलों का चुनावी सर्वे करवाया था उसमें यह दर्शाया गया था, यदि आज भी देश में चुनाव हो जाए तो भी नरेंदर मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे। मगर देश के विपक्षी दलों और भारत विरोधी विदेशी ताकतों को मोदी की यह प्रसिद्धि और भारत की बढ़ती ताकत देखी नहीं जा रही है।
गुमराह किसान की आड़ में साजिश
किसानों के बिल के विरोध में भोले भाले किसानों को गुमराह करके दिल्ली की सीमाओं पर लाकर बैठा दिया गया और उनके कंधे को को सरकार पर प्रहार करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह किसान नेता सरकार को यह भी आश्वासन दे रहे हैं की इस ट्रैक्टर रैली में हमारे हज़ारों कार्यकर्ता होंगे जो अपनी हरी वर्दी में होंगे और किसी भी असमाजिक तत्वों को ट्रैक्टर रैली में घुसने से रोकेंगे। इन सभी कार्यकर्ताओं के पास वॉकी टॉकी होगी। अब कई सवाल उठते हैं की हज़ारों की संख्या में इनके पास वाकी टाकी कौन उपलब्ध करवा रह है। दूसरा सवाल यह है की यदि इनके पास मोबाइल हैं तो वाकी टाकी की क्या जरूरत हैं। इसके पीछे भी इनका दिमाग काम कर रहा है। इनका सोचना यह है यदि पुलिस और आंदोलनकारी किसानों में भिड़ंत हुई और सरकार ने मोबाइल नेटवर्क को जाम कर दिया तो उन हालातों में वाकी टाकी काम करेगा। मोबाइल में किसी सूचना को अलग अलग लोगों तो पहुँचाने में वक्त लग सकता है मगर वाकि टाकी से एक सूचना सभी किसान नेताओं और कार्यकर्ताओं तक चंद सैकंड में पहुँच जाएगी।
26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली की तैयारियाँ
इन किसान आंदोलनकारियों ने जो तैयारी की हैं उसमें 26 जनवरी को बख्तर बंद ट्रैक्टरों को उतारा जायेगा। कई राज्यों से लाखों ट्रैक्टर मंगवाए गए हैं, जिनपर बैठकर बच्चे और महिलाएं भी आएँगी । 26 जनवरी को लाखों की संख्या में ट्रैक्टरों को दिल्ली में घुसाने की कोशिश की जाएगी। जिन राज्यों से दिल्ली पहुँचने में 6 से 8 घंटे लगते हैं वहां से ट्रैक्टर दिल्ली बुलाये जा रहे हैं। दिल्ली हरियाणा बॉर्डर पर ट्रैक्टर वर्कशाप बना दी गई है जहाँ खराब हुए ट्रैक्टरों की मरम्मत का काम हो रहा है। वहां ट्रैक्टरों पर लोहे की चादरे चढ़ाई जा रही हैं जिसपर पुलिस द्वारा किसी पर प्रकार के एक्शन का कोई फर्क न पड़े। आगे इस प्रकार के गार्ड लगाए गए हैं जो बैरिकेटिंग को हटा कर रास्ता बनायेंगे। पुलिस द्वारा आसूं गैस और बल प्रयोग से बचने के लिए इन लोगों ने ट्रैक्टरों पर शीशे वाले कैबिन तैयार किये हैं। इन आंदोलनकारियों ने पर्याप्त मात्रा में ट्रैक्टरों के डीजल का स्टॉक भी जमा कर लिया है। जिससे आंदोलन के दौरान यदि सरकार पेट्रोल पम्प और इनको डीजल देने से रोक लगा दे तो इनके पास पर्याप्त मात्रा में ईंधन उपलब्ध रहे।
आंदोलन के पीछे उद्देश्य
यह सारा तामझाम केवल किसान आन्दोलन के लिए नहीं किया जा रहा है। इसके पीछे साफ़ तौर से सरकार से युद्ध करने जैसे स्तिथि बना डाली गई है। यह पूरी तरह से दिल्ली पुलिस से भिड़ने की मनशा बना कर बैठे हैं। आशंका यह बनी हुई है कि `इनका इरादा दिल्ली पुलिस को पीछे धकेल कर दिल्ली के रिंग रोड पर ट्रैक्टर रैली निकालना है। इसके बाद रामलीला मैदान और जंतर मंतर पर कब्जा करके सीधा संसद को घेर कर उसमें घुसने का प्रयास करना और वहाँ अराजकता का वातावरण बनाना है । यदि यह अपने इन इरादों में कामयाब हो जाते हैं तो सहज अंदाजा लगाया जा सकता है की उस वक्त दिल्ली और देश का क्या माहौल होगा। जम्मू कश्मीर मैं बैठे धारा 370 के समर्थक सक्रिय होकर इनके साथ मिल जायेंगे और वो भी धारा 370 की बहाली की मांग पर अड़ जायेंगे।
आंदोलन के लिए करोड़ों का खर्च
अब यह सीधे सादे किसानों का आंदोलन नहीं रहा, यह पहले से सरकार के खिलाफ प्रायोजित आंदोलन की तैयारी करके यहाँ बैठे हैं। जो लोग कई महीनों का राशन लेकर यहाँ बैठे हैं। मेडिकल, सहायता के लिए क्लीनिक से लेकर दवाइयों की दुकाने, 8 बेड का अस्पताल बना लिया है। इसके अलावा जूते ठीक करने के लिए मौची, कपड़ों की सिलाई के लिए दर्जी, कपड़े धुलाई के लिए मशीने, डेंटल क्लीनिक बना लिया है, जिम, खाना बनाने की आधुनिक मशीने, हज़ारों गैस सिलेंडर इस्तेमाल हो रहे हैं। बढ़िया मंहगे वाटर प्रूफ टेंट, उनमें चारपाइयाँ, कंबल, तकिये, यानि हर प्रकार की लग्जरी सुविधा दी जा रही है। इन पर रोजाना हो रहे खर्च को देखकर आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है की दो महीने के अंदर कितने हजार करोड़ रूपये खर्च हो गए होंगें। सोचने की बात यह है इतना पैसा किसान तो अपनी तरफ से दे नहीं सकता तो यह मदद कौन कर रहा है।
NIA के पास विदेशों से हो रही फंडिंग के कई इनपुट हैं जिसपर NIA ने काम करना शुरू कर दिया है और बहुत से किसान आंदोलन से जुड़े लोगों से पूछताछ के लिए सम्मन भेजे गए हैं।
यदि सबसे बड़ा सवाल यह है की यदि 26 जनवरी के दिन आंदोलन दिशाहीन हो गया तो इसका जिम्मेदार कौन होगा। इसलिए सरकार का पहला कर्तव्य बनता है की यदि लोकतंत्र की आड़ में हिंसातंत्र का माहौल बनाया जा रहा है। ऐसे लोगों को किसी भी कीमत पर समाज और राष्ट्र के हितेषी नहीं कहा जा सकता। कानून और लोगों की रक्षा का दायित्व सरकार का है जब देश विरोधी ताकतों के पिठ्ठू बने अपने ही देश के लिए मुसीबत बन जाएँ तो सरकार को अपने लचीले रुख को छोड़ कर अपनी ताकत का इस्तेमाल करके अपने नागरिकों को अपनी सरकार के प्रति भरोसे को कायम रखना चाहिए।



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