

नई दिल्ली : दिल्ली विश्विधालय ने आज 1947 में विभाजन की विभीषिका को याद करते हुए एक उस त्रासदी से जुडी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया. इन प्रदर्शनी में विभाजन की विभीषिका से किस प्रकार क मानवीय त्रासदियाँ और घटनाएं उत्पन्न हुई सभी को तस्वीरों के रूप में दर्शाया गया हैं.
दिल्ली विश्विद्यालय ने स्वतंत्रता और विभाजन का अध्ययन केंद्र (Centre for INdependence and Patition Studies की स्थापना की घोषणा कर दी है. दिल्ली विश्विद्यालय साऊथ कैम्पस के निदेशक प्रोफ़ेसर श्री प्रकाश सिंह ने बताया कि ” इस विषय के अध्यन को लेकर केंद्र की गवर्निंग बॉडी गठित कर दी गई है. स्वतंत्रता और विभाजन का अध्ययन (Centre for Independence and Patition Studies) के अंतर्गत जो शोध किया जायेगा उसमें 1947 में भारत विभाजन ले वक्त उपजी गंभीर मानवीय त्रासदी, दर्द, नुक्सान पर भी अध्यन किया जायेगा.

देश में बहुत अध्यन हुआ जब अपनी आजादी के 75 वर्ष माना रहा था उसमें ध्यान में आया बहुत से ऐसे नायक हैं जो दूर दराज के इलाकों रहते थे, उनके कार्यों को प्रसिद्धि नहीं मिली उनके बारे में जानकारियां भी नहीं है. उनपर बहुत रिसर्च भी नहीं हुए, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में बहुत बड़ा योगदान दिया.
14 अगस्त 1947 में भारत का विभाजन हुआ, यह पिछली सदी की बहुत बड़ी भयवाह घटनाओं में याद किया जाता है. इसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई लाखों लोग मारे गए थे. इसमें बहन बेटियों की आबरू लूटी गई हत्यायें में भी हुई. तमाम इतिहासकारों ने इस पर काम भी किया है किन्तु अभी भी कुछ ऐसे अनछुए लोग और घटनाएं हैं जिनपर शोध किया जाना जरुरी है.
अब दिल्ली विश्विधालय Centre for Independence and Patition Studies के अंतर्गत सभी घटनाओं को इकठ्ठा करेगा. जो लोग अभी जीवित हैं और जिनकी उम्र 80 से 90 वर्ष की है उनसे जानकारियां एकत्रित करना. 1947 के वक्त की घटनाएं और उनकी स्मृति में जो कुछ है उसको एक्स्प्लोर करना यह सारा काम रिसर्च सेंटर भविष्य में करने वाला है.
2021 में प्रधान मंत्री मोदी ने भाषण कहा था की भारत विभाजन की विभाषिका 14 अगस्त के रूप में याद रखना चाहिए। प्रधान मंत्री के इस विषय को जयादा तवज्जो नही दी गई। पिछले वर्ष IGNCA (इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट) के द्वारा पत्र विश्विद्यालयों को भेजा गया था जिसमें स्वतंत्रता के विभाजन के वक्त ऐसे महापुरुष जिन्होंने अपने प्राण इस देश के लिए दे दिए किन्तु उनको देश की मुख्य धारा में स्थान नहीं मिला या जिन पर इतिहासकारों की नजर नहीं पड़ी, उनपर बहुत ज्यादा लिखा नहीं गया. दूसरी तरफ विभाजन के काल खंड में त्रासदी झेले लोगों पर भी शोध किया जाना चाहिए.
दिल्ली विश्विधालय के आसपास का बहुत सा इलाका ऐसा है जो विभाजन के वक्त लोग शरणार्थी बनकर आये थे. किंग्सवे कैम्प, मुखर्जी नगर मौरिस नगर, आदि हैं. दिल्ली विश्विद्यालय का देशबंधु कालेज शरणार्थी छात्रों के लिए बनाया था. दिल्ली विशवविद्यालय 1922 में स्थापित हुआ था। यहाँ के उपकुलपति कार्यालय पहले ब्रिटिश वाइसराय हॉउस हुआ करता था जिसमें लार्ड माउण्टबेन और कई वायसराय बैठ कर शासन किया करते थे. रामजस कालेज में चंद्रशेखर आजाद आकर रहे.
दिल्ली विद्यालय के Centre for Independence and Patition Studies के छात्रों को इसके अध्ययन में आसानी मिलेगी. यहीं बहुत सारे उल्लेख मिलेंगे जिनको किताबों में जगह नहीं दी गई.



