
नई दिल्ली : 6 June 2025 : हिन्दू धर्म में प्रत्येक पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं होता, बल्कि वह आत्मशुद्धि, तप, और मोक्ष की ओर अग्रसर करने वाला साधन होता है। गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी, ऐसे ही दो अत्यंत पुण्यदायी पर्व हैं, जो शरीर और आत्मा को शुद्ध करने वाले माने जाते हैं।
गंगा दशहरा का महत्व:
गंगा दशहरा #GangaDussehra ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन स्वर्ग से मां गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए कठोर तप किया और भगवान शिव की कृपा से गंगा का पृथ्वी पर आगमन हुआ। यह दिन पापों के नाश का प्रतीक माना जाता है।
गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी या किसी पवित्र जलाशय में स्नान, दान-पुण्य और जप-तप करने से दस प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं। इन पापों में तीन कायिक, चार वाचिक और तीन मानसिक पाप शामिल हैं। यही कारण है कि इसे ‘दशहरा’ कहा जाता है – यानी दस पापों का हरण।
निर्जला एकादशी का महत्व:
निर्जला एकादशी, #NirjalaEkadashi ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है और इसे साल की सबसे श्रेष्ठ व कठिन एकादशी माना गया है। यह ‘भीम एकादशी’ भी कहलाती है क्योंकि महाभारत काल में भीमसेन इसी एकादशी का व्रत रखते थे। अन्य एकादशियों के व्रत में फलाहार की अनुमति होती है, परंतु निर्जला एकादशी में जल तक ग्रहण नहीं किया जाता, “निर्जला”।
इस व्रत का पालन करने से वर्ष की सभी एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है। यह व्रत तप, संयम और आत्मनियंत्रण का प्रतीक है। निर्जला एकादशी में व्रती को रात्रि जागरण, विष्णु सहस्रनाम का पाठ, और भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण:
गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी, दोनों पर्व आत्मिक शुद्धि, साधना और पाप क्षालन के अवसर हैं। जहाँ गंगा दशहरा बाह्य शुद्धि और स्नान के माध्यम से मोक्ष की ओर ले जाता है, वहीं निर्जला एकादशी आंतरिक तप और उपवास के माध्यम से आत्मानुशासन की प्रेरणा देती है। दोनों ही पर्व व्यक्ति को संसारिक बंधनों से मुक्ति की राह दिखाते हैं।
गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी हिन्दू धर्म के ऐसे पर्व #HinduFestivals हैं जो जीवन को आध्यात्मिक पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं। इन पर्वों का पालन न केवल पारंपरिक आस्था का हिस्सा है, बल्कि यह मानसिक, शारीरिक और आत्मिक अनुशासन का अभ्यास भी है।



