
एक मानसिक रूप से रोगी और गुमनाम बच्चे की कहानी का क्या है राज ?
क्या यह शख्स है बच्चे का पिता ?
पुलिस को है DNA का बेताबी से इंतजार !
नई दिल्ली : दिल्ली पुलिस में किसी भी दर्ज मामले पर काम को करने के लिए बहुत से तरीके हैं। हालांकि, आधी-अधूरी की गई जांच के सन्देश अच्छे नही होते हैं। बस आप सुनिश्चित करें की आप सही तरीके से सही काम करते हैं तो तारीफ के हकदार हैं। वरना तारीफ़ का कोई मूल्य नहीं है। कोई भी कार्य तभी सार्थक होता है जब काम करने वाला व्यक्ति वास्तव में उसको शिद्द्त से करे।
दिल्ली के नार्थ डिस्ट्रिक्ट पुलिस का कम्प्यूटर सेल का मूल्यांकन उनके किये काम से किया जा सकता है। यह सेल गुमशुदा व्यक्तियों और बच्चों की तलाश में लगातार सफलता पूर्वक अपने कार्य को अंजाम दे रहा है। इस कम्प्यूटर सेल के काम का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की पिछले 75 दिनों में 104 लापता हुए बड़े व बच्चों को सफलता पूर्वक खोज निकाला।

इस कामयाबी का श्रेय इस सेल के इंचार्ज ASI विनोद वालिया और उनकी टीम को जाता है। ASI विनोद वालिया अपनी जांच के दौरान उन अनदेखे बिंदुओं पर काम करना शुरू करते हैं जिनपर आगे चलकर उनका ऑपरेशन सौ फीसदी सफलता को प्राप्त होता है।
क्या था यह सारा मामला :
दिल्ली के नार्थ डिस्ट्रिक्ट में एक ऐसा मामला पुलिस के पास आया जिस पर पुलिस ने बड़े ही पेशेवर अंदाज में जाँच के बाद सफलता पाई है। एक ऐसा शख्स जो मानसिक रूप से विक्षिप्त हो और जो खुद की भी पहचान भूल गया हो उसकी हकीकत तक पहुंचकर वास्तविकता का पता लगाना पुलिस के लिए एक चुनौती से कम नहीं था।
पुलिस पास आई थी एक कॉल :
नॉर्थ दिल्ली के सदर बाजार इलाके के सिंगाड़ा चौक में 1 दिसंबर 21 को पुलिस को कॉल मिली “कोई अज्ञात व्यक्ति जो पागलपन की हालत में है उसके पास एक बच्चा है जिसकी उम्र लगभग 2 साल की है। ऐसा लगता है वह बच्चे को कहीं से उठाकर लाया है। उसने उस बच्चे को अपनी चादर के अंदर छुपाया हुआ है। सूचना मिलते ही सदर बाजार थाने के थाना प्रभारी और जांच अधिकारी ASI देवेंदर मौके पर पहुंचे।

मौके पर देखा की एक शख्स बच्चे को अपने से लिपटाये हुए था और उसे छोड़ ही नहीं रहा था। पुलिस किसी बड़ी मुश्किल से उसे थाने ले गई।
मामले पर पुलिस की कार्यवाही :
पुलिस ने इस शख्श से बच्ची के बारे में जानकारी लेनी चाही मगर पागलपन के चलते यह शख्स खामोश रहा। उसने न अपने बारे में बताया और न ही उस बच्चे की जानकारी दी। बार बार पूछने के बाद जब पुलिस हताश हो गई तो बच्चे को शिशु गृह `पालना’ में भेज दिया। और उस अज्ञात शख्स को नार्थ ईस्ट दिल्ली, मानसिक रोग अस्पताल इहबास में भर्ती करावा दिया गया।
कम्प्यूटर सेल को केस सौंपा :
इस सारे मामले की जानकारी उत्तरी जिला के डीसीपी सागर सिंह कलसी के पास पहुँची। इस केस की खुलासे की जिम्मेदारी कम्प्यूटर सेल के इंचार्च ASI विनोद वालिया को सौंप दी गई।
नार्थ डिस्ट्रिक्ट डीसीपी सागर कल्सी बच्चे की तस्वीर दिखाते हुएविनोद वालिया और हवलदार आशीष इहबास पहुंचे। वहाँ के डॉक्टर्स से बातचीत हुई इस मामले में ख़ास वजह उस 2 साल के बच्चे के बारे में जानकारी हासिल करना था जो इस पागल व्यक्ति से ही मिल सकती थी। कई दोनों तक इहबास के डॉक्टर्स इस व्यक्ति के इलाज में लगे रहे रहे जिससे की यह अज्ञात मानसिक रोगी ठीक होकर कुछ जानकारी उपलब्ध करवा दे। तक़रीबन 12 दिनों के इलाज के बाद इस व्यक्ति की मानसिक स्तिथि में सुधार आना शुरू हुआ । इसने टुकड़ों में कुछ शब्द इहभास अस्पताल के डॉक्टरों को बताए। जब इन शब्दों को मिलाया गया तो उससे पता चला कि इस व्यक्ति का नाम श्रवण मंडल बताया व् पिता का नाम रामेश्वर मंडल व् गाँव बेहला जिला मधुबनी बताया। यह जानकारी डॉक्टरों द्वारा पुलिस को दे दी गई । पुलिस ने भी जब इससे पूछताछ की तो इसने अपने घर की लोकेशन कीर्तन भवन मंदिर के आसपास बताई ।
दिल्ली पुलिस का बिहार पुलिस से सम्पर्क :
13 दिसंबर इतनी जानकारी मिलने के बाद दिल्ली पुलिस की टीम ने बिहार पुलिस से सम्पर्क किया। उस गाँव के थाना फूलप्राश इंचार्ज को मदद के लिए साथ लेकर चुनाव आयोग की वेब साइट स्व उस गाँव की वोटर लिस्ट निकाल कर श्रवण मंडल के नाम को देखा गया । उस वोटर लिस्ट में श्रवण मंडल नाम के तीन लोग जो लगभग एक ही उम्र के थे । बिहार में दिल्ली पुलिस की टीम ने दिल्ली के इहबास अस्पताल से इसकी बिना दाड़ी की फ़ोटो मंगाई । दिल्ली से इसकी शेव बनवाकर फ़ोटो भेज दी ।
वोटर लिस्ट से ली गई सहायता :
वोटर लिस्ट की दोबारा जांच की गई । श्रवण मंडल नाम के व्यक्ति जिन थानों के अंतर्गत आते थे । उस इलाके के तीनों ब्लॉक डवलपमेंट ऑफीसर (BDOs) से बात की गई । जिसमें फूलप्राश, झंझारपुर, घोघडिया नगर पंचायत से बातचीत हुई और उनसे सहयोग मांगा गया । इलाके के लोकल लोगों के नम्बर लिए गए जो जमीनी स्तर पर समाज सेवा या राजनीति से जुड़े हुये थे ।
घोघडिया नगर के BDO का प्रयास :

घोघडिया नगर, गांव बथना चौलाही के रहने वाले कामथ नाम के व्यक्ति को जब श्रवण मंडल की दाढ़ी वाली और बिना दाढ़ी की तस्वीरों को दिखाया गया तो उसने उसको पहचान लिया । उसने बताया कि तस्वीर वाला शख्स उसके गाँव का रहने वाला हैं और 8 वर्ष पहले गाँव छोड़ कर चला गया था ।

श्रवण मंडल कि पुरानी फ़ोटो के साथ उसके पिता रामेश्वर मंडल कि फोटो व अधारकार्ड की फ़ोटो भी मंगाई गई । कामथ ने बताया कि श्रवण मंडल की शादी भारती नाम की महिला से हुई थी और उसकी दो 8 और 10 वर्ष की बेटियां हैं ।
श्रवण मंडल की पहचान कैसे हुई :
श्रवण मंडल के भाई जयप्रकाश और जीजा अरुण जो अम्बाला में रहते थे पुलिस ने फ़ोटो भेजकर पहचान करवाई । पुलिस ने श्रवण मंडल के परिवार के पुराने फ़ोटो ग्राफ भी मंगवा लिए ।
नार्थ डिस्ट्रिक्ट कम्प्यूटर सेल की टीम वापिस दिल्ली के मानसिक रोग अस्पताल इहबास आई और श्रवण मंडल को उसके पिता भाई और परिवार के लोगों के फोटो दिखाये जो उसने पहचान लिए ।
श्रवण मंडल की दूसरी शादी का खुलासा :
कुछ दिनों के बाद श्रवण मंडल का भाई और जीजा दिल्ली आए। उन्होंने पुलिस के सामने एक चौकाने वाला खुलासा किया । उन्होंने बताया कि श्रवण मंडल ने दिल्ली के मादीपुर किसी बंगाल की महिला से शादी कर ली थी । वह महिला इसे छोड़ कर चली किसी दूसरे व्यक्ति के साथ चली गई । जिस बच्चे को चादर में लपेटे पागलपन की हालत में यह पुलिस को मिला था वह बच्चा शायद इसी का है जिसको उस बंगाली महिला ने जन्म था और बाद में वह इसको छोड़ कर किसी दूसरे व्यक्ति के साथ चली गई । उसके जाने के बाद यह मानसिक संतुलन खो बैठा ।
पुलिस के सामने बड़ा सवाल :
पुलिस को इतनी मशक्कत करने के बाद इस अज्ञात मानसिक रोगी के बारे में जानकारी मिल चुकी थी किन्तु पुलिस के सामने एक बड़ा सवाल उस दो साल के बच्चे का था । अभी यह तय नही हो पाया था कि वह बच्चा श्रवण मंडल का है या यह इस बच्चे को पागलपन में कहीं से उठाकर लाया है । पुलिस ने DNA टेस्ट के लिए बच्चे के और श्रवण मंडल के सेम्पल लेबोरेट्री में भेज दिए हैं । अब पुलिस को DNA रिपोर्ट का बड़ी बेसब्री से इंतजार है ।
दिल्ली के इहबास अस्पताल में भर्ती श्रवण मंडल की मानसिक स्तिथि में सुधार के बाद पुलिस ने u/s 100.7 The mental health care act 2017 के तहत कोर्ट से इजाजत के बाद उसके परिवार के लोगों से मिलवाया और बाद में उनके सुपुर्द कर दिया ।

इस मामले के खुलासे के लिए नार्थ डिस्ट्रिक्ट की कंप्यूटर सेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही । इसमें सब एएसआई विनोद वालिया, हवलदार आशीष ने जांच के लिए जिन सूत्रों का सहारा लिया और लगातार डॉक्टर्स और रोगी से सम्पर्क बनाकर छोटी बड़ी सभी सूचना को इकठ्ठा करके इन केस के अंतिम छोर तक पहुंचे । अब पुलिस की जांच की कामयाबी DNA की रिपोर्ट पर टिकी है ।




