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व्यक्ति को वास्तविक अर्थों में मानव बनाता है ज्ञान ही : आरिफ मोहम्मद खान

केरल के राज्यपाल ने दिल्ली विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह पर रखे विचार

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नई दिल्ली : केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि शिक्षा ही व्यक्ति को ज्ञान  देती है और यह ज्ञान ही व्यक्ति को वास्तविक अर्थों में मानव बनाता है। शिक्षा ही व्यक्ति को सशक्त बनाती है, लेकिन यह उसका संस्कार है जो उसे ज्ञान का उपयोग दूसरों के लाभ के लिए करने हेतु निर्देशित करता है। खान ने कहा कि सच्चे अर्थों में विद्वान वही होता है जिसके पास मूल्यों का बोध होता है। आरिफ मोहम्मद खान दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा ‘स्वराज’ से ‘नव-भारत’ तक विचारों का पुनरावलोकन विषय पर इस तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे। शताब्दी समारोह के हिस्से के रूप में, ‘स्वराज’ से ‘नए भारत’ के विचारों पर पुनरीक्षण पर तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग द्वारा किया जा रहा है। संगोष्ठी के समापन समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में आईसीसीआर के अध्यक्ष डॉ। विनय सहस्रबुद्धे उपस्थित रहे जबकि समारोह की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० योगेश सिंह ने की।

मोहम्मद खान ने अपने संबोधन में शिक्षा और ज्ञान के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय को इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा कि गुलामी की लंबी अवधि के बावजूद, भारत प्राचीन काल के अपने ज्ञान को बचाने और उसकी रक्षा करने में सक्षम रहा है। विवेकानंद और रविंद्र नाथ टैगोर के समय से ही हमारे लोकाचार और मार्गदर्शक सिद्धांत, जो हमारी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को दर्शाते हैं, एक समावेशी भारत के विचार की ओर इंगित करते रहे हैं। उन्होंने विवेकानंद के विचारों का विश्लेषण करते हुए कहा कि आनंद जीवन का मूल नहीं है, बल्कि जीवन का लक्ष्य ज्ञान की खोज है।

जीवन में शिक्षा को परिवर्तन का सबसे शक्तिशाली उपकरण बताते हुए मोहम्मद खान ने कहा कि शिक्षा ही जीवन में परिवर्तन ला सकती है। जीवन का उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करना होना चाहिए आवर ज्ञान का उद्देश्य सेवा आवर विविधता में एकता का विकास करना है। धर्म पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का अर्थ बहुत ही व्यापक है, लेकिन इसकी व्याख्या हमेशा गलत तरीके से केवल रिलिजन के रूप में की गई और रिलिजन को ही पहचान चिन्ह मान लिया गया, जोकि समस्याएं पैदा करता है। इसे ठीक करने की आवश्यकता है। इसके लिए उन्होंने शिक्षाविदों से बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि शैक्षणिक संस्थाएं आवर शिक्षक वर्ग इस दृष्टिकोण को बदलने में मुख्य दायित्व निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि लोगों के बीच जातिवाद और अलगाव भावना को खत्म करके सामुहिक भावना से मानवता की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है।

उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे शिक्षा में जुट जाएं, बाकि सब खुद आता जाएगा। शिक्षा ही आपको सशक्त बनाएगी।

शिक्षा की भूमिका पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि त्याग और मानवता की सेवा की अनुभूति ज्ञान से ही होती है और विद्वान वही होता है जिसके पास इन मूल्यों का सही बोध होता है। उन्होंने अंत में शिक्षक समुदाय से आह्वान किया कि वे विद्यार्थियों अपने सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति अधिक जागरूक करें, यही भावी भारत के समग्र विकास में योगदान देगा।

समापन समारोह के दौरान अपने स्वागत भाषण में डीयू कुलपति प्रो योगेश सिंह ने कहा कि इस तीन दिवसीय संगोष्ठी से निकले विचारों को अमल में लाना होगा क्योंकि बिना कार्रवाई के विचारों का कोई अर्थ नहीं होता. उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय ही गहन शोध के माध्यम से प्रौद्योगिकी के निर्माता होंगे, और तकनीक ही भारत को विश्व गुरु बनाने की क्षमता रखती है. आज के दिन सभी भारतीयों का यही सपना है कि देश विश्वगुरु बने. प्रो सिंह ने कहा कि अनुसंधान, विकास, सहयोग अथवा खरीद के माध्यम से तकनीक हासिल करनी होगी क्योंकि आयात का न केवल आर्थिक प्रभाव पड़ता है, बल्कि यह दर्शाता है कि हम अपनी अक्षमता के लिए भुगतान कर रहे हैं। विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं के माध्यम से आने वाले विचारों के महत्व पर जोर देते हुए, सिंह ने विश्वविद्यालय और इसकी शिक्षा और मूल्य प्रणाली को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने सभी से आह्वान किया कि इन विचारों को न केवल अपने विचारों में, बल्कि अपने कार्यों में भी शामिल करें। यही मानवता के लिए शिक्षा की सच्ची सेवा होगी।

समारोह के विशिष्ट अतिथि आईसीसीआर के अध्यक्ष डॉ विनय सहस्रबुद्धे ने अपने संबोधन में स्वदेश में “स्व” के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह अतीत से भविष्य तक, वर्तमान के माध्यम से यात्रा का प्रमुख प्रेरक होगा। उन्होंने कहा कि एक ‘नया भारत’ बनाने के लिए, हमारे लिए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपनी संस्कृति के पांच मूल सिद्धांतों पर अपने सिद्धांतों का निर्माण करें जिन्हें दुनिया को भी पहचानने की आवश्यकता है। उन्होंने इन पांच सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आध्यात्मिक लोकतंत्र, अंत्योदय, प्रकृति माँ के प्रति कृतज्ञता, हमारी विविधता में एकता और वसुदेव कुटुम्बकम ही ये पांच सिद्धांत हैं।

उन्होंने नव भारत के निर्माण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से रोजमर्रा के जीवन में लैंगिक समानता, मजबूत प्रतिबद्धता, संविधानवाद व मजबूत लोकतंत्रीकरण आदि जैसे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाने की सराहना करते हुए इन्हें समय की आवश्यकता भी बताया। उन्होंने कहा कि ‘नव भारत’ में जाने के लिए अगले 25 वर्षों की अमृतकाल अवधि न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि यह अमृत की तरह है। हम सभी को निरंतर यथास्थितिवाद की मानसिकता से दूर रहने की जरूरत है, तभी सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास के माध्यम से नए भारत की सुबह होगी।

संगोष्ठी के समापन समारोह के दौरान मुख्य अतिथि माननीय राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के अलावा विशिष्ट अतिथि विनय सहस्रबुद्धे, डीयू के कुलपति प्रो. योगेश सिंह, डीन ऑफ़ कॉलजज बलराम पाणि, डीयू के साउथ दिल्ली परिसर के निदेशक प्रो. श्री प्रकाश सिंह, सीओएल की निदेशक प्रो. पायल मागो, राजनीतिक विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. संगीत रागी आदि सहित अनेकों गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

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