
समाज में पुलिस की छवि पर उंगलिया उठना एक आम धारणा है। अक्सर अक्सर पुलिस विभाग के कर्मचारी जनता के सवालों के घेरे रहते हैं। कानून व्यवस्था को बनाये रखने के अतिरिक्त सामाजिक दायित्वों को निभाने की शिक्षा पुलिसकर्मियों को दी जाती हैं। समाज में बढ़ते अपराधों की लम्बी फेहरिस्त के चलते पुलिस सोशल पुलिसिंग पर कम ध्यान दे पाती है।
उत्तरप्रदेश के थाना अलीगंज के पुलिस कर्मियों ने मानवीय मूल्यों की मिसाल पेश की है। समूचे प्रदेश में आज इस थाने की हो रही है।
दरअसल 18 मई को किला रोड पर एक महिला सावित्री और उसके पिता रक्षपाल की पीट पीट कर हत्या कर दी गई थी। यह हत्या सावित्री के पति पारस, सास, ससुर ओर बुआ ने कई लोगों ने मिलकर की थी।
सावित्री की हत्या के बाद उसके पति और ससुराल के लोगों के जेल जाने के बाद उसका दो साल का बच्चा अकेला रह गया। इस हत्या कांड के बाद इस बच्चे के रिश्तेदारों ने भी अपने आप को अलग रखा। कोई भी सगा सम्बन्धी इस मासूम की देखभाल के लिए आगे नहीं आया न किसी को इस अकेले हो गए दो साल के मासूम बच्चे पर तरस आया।
जब समाज का एक तबका मानवता भूल बैठा तो ऐसे में अलीगंज थाने की पुलिस ने इंसानियत को मरने नहीं दिया। थाने की महिला स्टाफ इस मासूम की देखभाल के लिए सामने आई। थाने के पुलिस स्टाफ ने इस मासूम को अपने खुद के बच्चे की तरह पालना शुरू कर दिया। थाने की महिला स्टाफ ने एक माँ की ममता इस मासूम को दी। उसके खानपान से लेकर उसके लिए नए कपड़े, खिलौने तक लाये गए।
दिन देखभाल के बाद यश को उसका मामा राहुल गुप्ता को सौंप दिया गया।
अलीगंज थाना के इस प्रशंसनीय कार्य को लेकर समूचे प्रदेश में सराहा जा रहा। सोशल मिडिया में भी इसकी विशेष चर्चा है। पुलिस के आला अधिकारी भी प्रदेश पुलिस से यही आशा करते हैं की सिटिज़न फर्स्ट के सिद्धांत का अनुसरण करके समाज के सामने पुलिस की बेमिसाल छवि को बनाये।



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