

15 सालों से जो मालिक उसकी वफादारी की मिसाल देते थे उसने 49 लाख देखकर अपना ईमान खो दिया और कर दिया विश्वासघात
नई दिल्ली : सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट के स्पेशल स्टाफ ने इनामी मुजरिम को गिरफ्तार किया है, इसका नाम राजीव लोचन मिश्रा (42) है, दिल्ली के शालीमार बाग पुलिस को 11 सितंबर 2018 से तलाश थी। वर्ष 2019 में दिल्ली पुलिस द्वारा इसकी गिरफ्तारी पर 50,000 हजार के इनाम की घोषणा भी की गई थी।
11 सितंबर 2018 को शालीमार बाग़ में रहने वाले देवी दयाल मित्तल ने पुलिस स्टेशन में अपने कर्मचारी राजीव लोचन मिश्रा द्वारा 50 लाख की रकम लेकर फरार होने की शिकायत दर्ज करवाई। देवी दयाल मित्तल का चाँदनी चौक के चावड़ी बाजार में राम शरण दास एंड कंपनी के नाम से कागज का कारोबार है।
राजीव लोचन मिश्रा उनकी कंपनी में पिछले पंद्रह सालों से एक कर्मचारी के रूप में काम करता था। कम्पनी के मालिकों को राजीव लोचन मिश्रा पर बहुत भरोसा था। 11 सितंबर 2018 को देवी दयाल के भाई सतप्रकाश मित्तल ने 11 लाख रूपये दिल्ली की पीरा गढ़ी की एक पार्टी को देने के लिए दिए। जब सतप्रकाश मित्तल अपने घर खाना खाने के लिए गए तो पीरागढ़ी से फ़ोन आया की पैसा पहुंचा नहीं। सतप्रकाश मित्तल ने राजीव लोचन को फ़ोन मिलाया तो उसने फ़ोन उठाया नहीं। सतप्रकाश को शक हुआ तो वह शालीमार बाग़ के ऑफिस पहुंचा और तिजौरी खोली तो उसमें से 38 लाख रूपये गायब थे इसके साथ साथ सारे राजीव के पहचान के सारे कागजात भी। कम्पनी की मोटरसाइकिल भी राजीव लोचन लेकर फरार था। पुलिस ने कुल 49 लाख रूपये की चोरी का मामला दर्ज कर लिया।
शालीमार बाग़ थाने की पुलिस ने राजीव लोचन मिश्रा को ढूंढेने का काफी प्रयास किया मगर सफलता हाँथ नहीं लगी। इसके बाद यह कोर्ट द्वारा भगोड़ा घोषित कर दिया गया। इसके ऊपर दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने 50 हजार के इनाम का एलान भी कर दिया था । पुलिस ने CCTV कैमरे की फुटेज और मोबाईल नंबरों से उसको ढूंढने की कोशिश की गई उसके लिए पुलिस की कई एजेंसियां लगाई गई। मगर 1 साल 11 महीने 16 दिन के बाद यह कामयाबी सेन्ट्रल डिस्ट्रिक्ट स्पेशल स्टाफ के हाँथ लगी।

इस केस की सफलता के पीछे सेन्ट्रल डिस्ट्रिक्ट के डीसीपी संजय भाटिया और एडिशनल DCP रोहित मीणा के नेतृत्व का कमाल कहा जा सकता है। दोनों आला अधिकारीयों ने स्पेशल स्टाफ में जाकर वहाँ का मुआयना किया और वहाँ पूरे स्पेशल स्टाफ के पुलिस कर्मियों को बड़े बड़े इनामी अपराधियों को पकड़ने के प्रेरित किया और इसी जज्बे को दिखाते हुए स्पेशल स्टाफ के इंस्पेक्टर ललित कुमार ने काम करना शुरू कर दिया। इसके लिए एएसआई योगेंद्र, सिपाही अमित कुमार और सिपाही महिंदर को लेकर एक टीम बनाई। स्टाफ के सिपाही अमित कुमार ने शालीमार थाने के फरार इनामी मुजरिम राजीव लोचन मिश्रा की जानकारी दी। सेन्ट्रल डिस्ट्रिक्ट ऑपरेशन सेल कार्यभार देख रहे एसीपी ओ.पी. लेखवाल ने राजीव लोचन से सम्बन्धी सभी जानकारी और सूचनाएं इकठ्ठी करने का आदेश दिया।

24 अगस्त सिपाही अमित कुमार को पता चला की राजीव लोचन मिश्रा गुजरात के सूरत में है। उसकी पहचान के लिए उसका फोटो तक नहीं था उसके रहने की जगह की पुख्ता जानकारी भी उपलब्ध नहीं थी। टीम दिल्ली से रवाना होकर 24 अगस्त सूरत पहुंची और राजीव लोचन मिश्रा के बारे में जानकारी हासिल की। काफी कठिन प्रयासों के बाद, यह पता चला कि वह गुजरात के सूरत के पिपोदरा औद्योगिक क्षेत्र के एक कारखाने में काम करता है। वहां लगभग 500 कारखाने हैं और प्रत्येक कारखाने में लगभग 300-500 मजदूर काम करते हैं । इसके बाद, स्थानीय लोगों और लेबर ठेकेदारों से संपर्क किया गया, उनको राजीव लोचन का नाम बताया गया आखिर में इस मेहनत का सफल परिणाम निकला। राजीव लोचन मिश्रा नाम का एक व्यक्ति कारखाने में काम करता है। स्पेशल स्टाफ की टीम एल्युमिनियम कंपनी, जीआईडीसी, गुप्ता गली, पिपोदरा, सूरत में जाकर आरोपी के नाम से मज़दूरों से पूछताछ की, तो पता चला की राजीव नाम का एक शख्स उसी फैक्ट्री में काम करता है। पुलिस ने इसके बाद मज़दूरों से फ़ोन करवाकर उसे बुलवाया। पूछताछ के लिए उसे हिरासत में ले लिया गया। बाद में उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया। इसके बाद पुलिस से ट्रांज़िट रिमांड पर दिल्ली ले आई। पुछताछ के दौरान, आरोपी राजीव ने खुलासा किया कि वह जेल नहीं जाना चाहता था। इसलिए चोरी करने के बाद, वह भाग गया और नोएडा पहुंचकर अपने जानकार वरुण पाठक से संपर्क किया। उसने मदद के लिए वरुण पाठक को 11 लाख दिए। इसके बाद दोनों देवघर, झारखंड पहुंच गए। राजीव ने चोरी की सारी रकम अपने भाई दिवाकर मिश्रा और उनकी पत्नी सलोचना कस पास रखवा दी। उसके बाद वह अपने रिश्तेदारों कुंदन और अजय के साथ बिहार के सहरसा में रहने लगा और पुलिस के शिकंजे से बचने के लिए अपने सारे मोबाइल फोन बंद कर दिए और अपने परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों के संपर्क में कभी नहीं रहा। गिरफ्तारी से बचने के लिए, उसने बिहार छोड़ दिया और सूरत पहुंच गया और अपने परिचित पप्पू पाठक से संपर्क किया और पीपोदरा की एक फैक्ट्री में काम करने लगा।
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