
नई दिल्ली : मनुष्य को हर कदम पर दूसरों के साथ व सहयोग की जरूरत पड़ती है. चाहें बात जीवन की कठिनाइयों की हो या किसी परीक्षा की. अगर कोई हमें हरदम आगे बढ़ते रहने की हिम्मत दे, तो कठिन सफर भी आसान लगने लगता है.
आज के इस युग में गरीब अशिक्षित बच्चों के प्रति समाज का नजरिया बहुत बदला हुआ होता है. कोई विरले ही होते हैं जो किसी के जीवन को नई राह देने के लिए आगे आते हैं. दिल्ली पुलिस के हवलदार थान सिंह ने अशिक्षित गरीब बच्चों को शिक्षित दिला कर अपने संकल्प को साकार किया और इन गरीब बच्चों को समाज की आलोचनाओं से भी बचाया.
दिल्ली पुलिस में महज एक सिपाही के तौर पर भर्ती हुए थान सिंह ने उन बच्चों के भविष्य को संवार कर रख दिया. जो बच्चे महानगरीय गंदगी में गुमनामी का जीवन जी रहे थे.
आज से आठ वर्ष पूर्व दिल्ली के लाल किला पुलिस चौकी में तैनात हवलदार थान सिंह ने 4 बच्चों को फुरसत के पलों में खुद पढ़ाना आरंभ किया. इन बच्चों की छोटी सी पाठशाला लाल किला पार्किंग में बने एक मंदिर से शुरू हुई. यह बच्चे उन गरीब मजदूरों के थे जो लाल किले के आस पास दिहाड़ी मजदूरी का काम किया करते थे. मां बाप काम पर चले जाते थे, इनके बच्चे दिनभर सड़कों पर मारे मारे फिरते थे, कुछ बच्चे कूडाघरों में कूड़ा चुनते थे. सड़कों और बाजारों में पानी की खाली बोतलें और बीयर केन इकट्ठी करते थे. गुटखे खाना, फ्लूड सूंघना इनकी आदत बन चुकी थी. इन बच्चों को बड़ी मशक्कत करके अपनी पाठशाला से जोड़ा. इन बच्चों के अंदर पढ़ाई के प्रति जिज्ञासा जगाई. धीरे धीरे राजघाट, विजय घाट, शांतिवन में बने स्लम और झुग्गियों में रहने वाले गरीब परिवेश में जीवन गुजार रहे बच्चों के मां बाप खुद अपने बच्चों को हवलदार थान सिंह की छोटी सी पाठशाला मे लेकर आने लगे. इनके पढ़ने लिखने की सारी सामग्री का इंतजाम थान सिंह अपनी तनख्वाह के पैसों से किया करने लगे. इसके बाद जब दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों को अपने हवलदार के शिक्षण कार्य के विषय में जानकारी हुई तो उनके भी हांथ मदद के लिए आगे आए.
इस पाठशाला की ख्याति जैसे जैसे बढ़ने लगी बच्चों की संख्या में भी इजाफा होने लगा. अब इन बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण और शिक्षा की ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए सीढ़ियों की जरूरत थी. इसके लिए थान सिंह ने सरकारी स्कूलों से संपर्क किया और नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट डीसीपी की सहायता से उनका सरकारी स्कूल में दाखिला करवा दिया.
थान सिंह की पाठशाला के बच्चों ने समाज के अन्य बच्चों की तरह पहली बार पीठ पर बस्ता लटका कर स्कूल के अंदर कदम रखा वह थान सिंह के लिए अविस्मरणीय क्षण था. थान सिंह ने कहा कि “मेरी तपस्या सफल हो गई”.
आज इन बच्चों का रिजल्ट आया जिसे लेकर थान सिंह बहुत उत्साहित और गर्वित महसूस कर रहे हैं. इन बच्चों के स्कूल का परीक्षाफल काबिले तारीफ़ आया है. इन बच्चों ने यह साबित कर दिया की वे धूल के फूल थे जिनके जीवन को माली बनकर थान सिंह ने संवारा है.
वर्तमान समय में थान सिंह की पाठशाला में 80 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. इन बच्चों की शिक्षा संबंधी सामग्री, कपड़े, जूते सभी का इंतजाम हवलदार थान सिंह के द्वारा किया जाता है. थान सिंह के इरादों को देखकर यह कहना पड़ेगा…..


